+ प्रभु के शरीर की नील कमलों के माध्यम से महिमा -
सोहइ सरीरं तुह पहु, तिहुयणजणणयणबिंबविच्छुरियं ।
पडिसमयमच्चियं च, चारुतरलणीलुप्पलेहिं व ॥42॥
शोभते शरीरं तव प्रभो! त्रिभुवनजननयनबिम्बविच्छुरितं ।
प्रतिसमयमर्चितं च, चारुतरलनीलोत्पलैरिव॥
त्रिभुवन प्रभु के नयनों के, प्रतिबिम्बों से तन चित्र-विचित्र ।
ऐसा लगता मानो चञ्चल, नील-कमल से हैं पूजित॥
अन्वयार्थ : हे प्रभु! तीन लोक के जीवों के नेत्रों में पड़े हुए प्रतिबिम्बों से चित्र-विचित्रमय आपका शरीर ऐसा जान पड़ता है, मानो सुन्दर एवं चञ्चल नीलकमलों से प्रतिसमय पूजित ही है ।