+ इन्द्र द्वारा प्रभु के चरण-कमलों में भक्ति-भाव का प्रदर्शन -
अहमहमिआए णिवडंति, णाह छुहियालिणोव्व हरिचक्खू ।
तुज्झ च्चिय णहपहसर, मज्झट्ठियचलणकमलेसु ॥43॥
अहमहमिकया निपतन्ति, नाथ! क्षुधितालय इव हरिचक्षूंषि ।
तव अर्चितनखप्रभासरो, -मध्यस्थितचरणकमलेषु॥
पूज्य नखों की प्रभा-सरोवर, में स्थित तव चरण-कमल ।
'मैं पहले' कह उन पर गिरते, क्षुधित भ्रमर से इन्द्र-नयन॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! हे प्रभो ! आपके पूजित जो नख, उनकी जो प्रभा (कान्ति), वही हुआ सरोवर, उसके मध्य में स्थित जो चरण-कमल, उनमें भूखे भ्ररों के समान इन्द्रों के नेत्र अहम्-अहम् (मैं-मैं) इस रीति से गिरते हैं ।