+ प्रभु का आकाशमार्ग से गमन होने पर स्वर्ण-कमलों की रचना -
कणयकमलाणमुवरिं, सेवातुह विबुहकप्पियाण तुहं ।
अहियसिरीणं तत्तो, जुत्तं चरणाण संचरणं ॥44॥
कनककमलानामुपरि, सेवातुरविबुधकल्पितानां तव ।
अधिकश्रीणां तत्तो, जुत्तं चरणानां संचरणं॥
प्रभो! आपके चरण-कमल हैं, अतिशय शोभा से संयुक्त ।
अत: भक्तिवश देव-विनिर्मित, स्वर्ण-कमल पर गमन सुयुक्त॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपके चरण, अत्यन्त उत्तम शोभा से संयुक्त हैं; इसलिए भक्तिवश देवों द्वारा रचित सुवर्ण-कमल के ऊपर उनका गमन करना युक्त ही है ।