+ चन्द्रमा के बिम्ब पर हिरण के दिखाई देने का कारण -
सइहरिकयकण्णसुहो, गिज्जउ अमरेहिं तुह जसो सग्गे ।
मण्णे तं सोउमणो, हरिणो हरिणंकसल्लीणो ॥45॥
शचीन्द्रकृतकर्णसुखं, गीयते अमरैस्तव यश: स्वर्गे ।
मन्ये तच्छ्रोतुना:, हरिण: हरिणांकसल्लीन:॥
शची-इन्द्र के कानों को प्रिय, देव सदा तव यश गाते ।
मानो उसके श्रवण हेतु ही, हिरण चन्द्र की गोद बसे॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिसके बारे में सुनने से इन्द्र-इन्द्राणी के कानों को सुख होता है - ऐसा आपका यश, सदैव स्वर्ग में देवता लोग गाया करते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि उस यश को सुनने के लिए ही मृग (हिरण) चन्द्रमा में जाकर लीन हो गया है ।