+ प्रभु के चरण-कमलों को नमस्कार करने वाले लक्ष्मीपति क्यों? -
अलियं कमले कमला, कमकमले तुह जिणिंद सा वसइ ।
णहकिरणणिहेण घडंति, णयजणे से कडक्खछडा ॥46॥
अलीकं कमले कमला, क्रमकमले तव जिनेन्द्र!सा वसति ।
नखकिरणनिभेन घटते, नतजने तस्या: कटाक्षच्छटा:॥
कमला नहीं रहे कमलों में वह रहती तव चरण-कमल ।
क्योंकि नखों की किरणों से करती कटाक्ष जब भविजन नत॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! लक्ष्मी, कमल में रहती है - यह बात सर्वथा असत्य है क्योंकि वह तो आपके चरण-कमलों में रहती है, जब भव्य जीव, आपको सिर झुका कर नमस्कार करते हैं तो आपके नख-किरण के बहाने उस लक्ष्मी का कटाक्ष-पात प्रतीत होता है ।