
जे कयकुवलयहरिसे, तुम्मि विद्देसिणो स ताणं पि ।
दोसो ससिम्मिव्वा, आहयाण जह वाहिआवरणं ॥47॥
ये कृतकुवलयहर्षे, त्वयि विद्वेषिण: स तेषामपि ।
दोष: शशिनि इव, आहतानां यथा बाह्यावरणम्॥
भूमण्डल प्रभु हर्षित करते, द्वेष करे तो उसका दोष ।
यथा चन्द्र से द्वेष करे तो, दोष उसी का, शशि निर्दोष॥
अन्वयार्थ : चन्द्रमा, सदैव पृथ्वी को आनन्द ही देने वाला है; किन्तु जो मनुष्य, रोग-ग्रस्थ हैं, वे चन्द्रमा से घृणा करते हैं । जिस प्रकार चन्द्रमा के घृणा करने में उनके बाह्य आवरण कर्म का दोष है, चन्द्रमा का नहीं; उसी प्रकार हे जिनेन्द्र! आप तो समस्त भूण्डल को आनन्द ही देने वाले हैं । यदि ऐसा होने पर भी कोई मूर्ख, आपसे विद्वेष करे तो वह उसी का दोष है, इसमें आपका कोई दोष नहीं ।