+ प्रभु की स्तुतिरूप नदी, मरणरूपी दावाग्नि को बुझाने में समर्थ -
को इह हि उव्वरंतो, जिण जयसंहरणमरणवणसिहिणो ।
तुह पयथुइणिज्झरणी, वारणमिणमो ण जइ होंति ॥48॥
क इह हि उद्धरेत्, जिन! जगत्संहरणमरणवनशिखिन: ।
तव पादस्तुतिनिर्झरिणी, वारणमिदं न यदि भवति॥
जग-संहारक मरण-विपिन की, अग्नि से जग का उद्धार !
कैसे होता यदि न बुझाये, प्रभु-स्तवन-नदीया की धार॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! आपके चरणों की स्तुतिरूप नदी के जल से समस्त संसार का संहार करने वाली मरणरूपी दावाग्नि बुझ गई, सो अच्छा ही हुआ । ऐसा लगता है, मानो उसका उद्धार हो गया ।