
करजुवलकमलमउले, भालत्थे तुह पुरो कए वसइ ।
सग्गापवग्गकमला, कुणंति तं तेण सप्पुरिसा ॥49॥
करयुगलकमलमुकुले, भालस्थे तव पुरत: कृते वसति ।
स्वर्गापवर्गकमला, कुर्वन्ति तत् तेन सत्पुरुषा:॥
प्रभु के सन्मुख हाथ जोड़ कर, भविजन निज मस्तक धरते ।
इसीलिए वे सज्जन नर तब, स्वर्ग-मोक्षलक्ष्मी पाते॥
अन्वयार्थ : हे देव! जिस समय जीव, आपके सामने दोनों हाथरूपी कमलों को मुकुलित कर अर्थात् हाथ जोड़ कर मस्तक पर रखते हैं; उस समय उन्हें स्वर्ग तथा मोक्ष-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है; इसीलिए उत्तम पुरुष, प्रभु के सन्मुख हाथ जोड़ कर मस्तक पर रखते हैं ।