+ प्रभु के आगे मस्तक झुकाने से मोह-ठग द्वारा स्थापित मोहन-धूलि का नाश -
वियलइ मोहणधूली, तुह पुरओ मोहठगपरिट्ठविया ।
पणवियसीसाउ तओ, पणवियसीसा बुहा होंति ॥50॥
विगलति मोहनधूलि:, तव पुरतो मोहठकस्थापिता ।
प्रणमितशीर्षान् तत:, प्रणमितशीर्षा बुधा भवन्ति॥
शीष नवा प्रभु को वन्दन से, मोह -प्रवंचक मोहन-धूल ।
प्रभु सन्मुख हो नष्ट अत:, सुधी करें उनको वन्दन॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जो भव्य जीव, आपको मस्तक झुका कर नमस्कार करते हैं, उनकी मोह-ठग के द्वारा मस्तक पर स्थापित मोहन-धूलि आपके सामने मस्तक झुकाने से शीघ्र ही नष्ट हो जाती है; इसीलिए विद्वान् पुरुष आपको मस्तक झुका कर नमस्कार करते हैं ।