
तं चेव मोक्खपयवी, तं चिय सरणं जणस्य सव्वस्स ।
तं णिक्कारणविद्दो, जाइजरामरणवाहिहरो ॥52॥
त्वं चैव मोक्षपदवी, त्वं चैव शरणं जनस्य सर्वस्य ।
त्वं निष्कारणवैद्य:, जातिजरामरणव्याधिहर:॥
नाथ! आप ही शिवपद एवं, सकल जनों के शरणागार ।
बिन कारण हो वैद्य आप ही, जन्म-जरा-मृतु नाशनहार॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! आप ही मोक्ष का मार्ग हैं । समस्त प्राणियों के आप ही शरण हैं और जन्म, जरा, मरणादि रोगों को नाश करने वाले आप ही निष्कारण वैद्य हैं ।