
किच्छाहि समुवलद्धे, कयकिच्चा जम्मि जोइणो होंति ।
तं परमकारणं जिण, ण तुाहिंतो परो अत्थि ॥53॥
कृच्छ्रात्समुपलब्धे, कृतकृत्या यस्मिन् योगिनो भवन्ति ।
तत्परमपदकारणं जिन! न त्वत्त: परोऽस्ति॥
बड़े कष्ट से पाकर तुमको, योगीजन होते कृतकृत्य ।
अत: आपके सिवा परमपद, का कारण नहिं कोई अन्य॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! बड़े कष्टों से आपको प्राप्त करके योगीजन, कृतकृत्य हो जाते हैं अर्थात् संसार में उनको दूसरा कोई भी काम बाकी नहीं रहता; इसलिए आपसे भिन्न अन्य कोई भी परमपद का कारण नहीं है ।