+ विवेक बुद्धियों की दृष्टि में प्रभु ही एकमात्र सारभूत -
णिस्सेसवत्थुसत्थे, हेयमहेयं निरूवमाणस्स ।
तं परमप्पा सारो, सेसमसारं पलालं वा ॥55॥
निश्शेषवस्तुसार्थे, हेयमहेयं निरूप्यमाणस्य ।
त्वं परमात्मा सार:, शेषमसारं पलालं वा॥
सकल-पदार्थों के समूह में, हेय-ग्राह्य को जो लखते ।
प्रभो! आप ही सार, अन्य सब, सूखे तृण-सम हेय दिखें॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जो मनुष्य समस्त वस्तुओं के समूह में हेय तथा उपादेय को देखने वाला है, उस पुरुष की दृष्टि में हे परमात्मा! आप ही सार हैं और आपसे भिन्न समस्त पदार्थ, सूखे तृण के समान असार हैं ।