
धरइ परमाणुलीलं, जं गब्भे तिहुयणंपि तंपि णह ।
अंतो णाणस्स तुह, इयरस्स न एरिसी महिमा ॥56॥
धरति परमाणुलीलां, यद्गर्भे त्रिभुवनमपि तदपि नभ: ।
अन्तो ज्ञानस्य तव, इतरस्य न ईदृशी महिमा॥
जिसमें यह त्रिभुवन परमाणुवत् भासित हो वह नभ भी ।
अणु समान है ज्ञान-ज्योति में, ऐसी महिमा कहीं नहीं॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! जिस आकाश के गर्भ में ये तीनों भुवन, परमाणुमात्र लीला को धारण करते हैं अर्थात् परमाणु के समान भासित होते हैं; वह सम्पूर्ण आकाश, आपके ज्ञान में परमाणु के समान ही जान पड़ता है - ऐसी महिमा आपके ज्ञान की है, किन्तु आपसे भिन्न किसी अन्य देव के ज्ञान में ऐसी महिमा नहीं है ।