+ प्रभु के गुण-वर्णन करने में सरस्वती की असमर्थता -
भुवणत्थुय थुणइ जइ, जए सरस्सई संतयं तुहं तहवि ।
ण गुणंतं लहइ तहिं, को तरइ जडो जणो अण्णो ॥57॥
भुवनस्तुत्य स्तौति यदि, जगति सरस्वती सततं त्वां तथापि ।
न गुणान्तं लभते तर्हि, कस्तरति जडो जनोऽन्य:॥
प्रभो! जगत् में सरस्वती भी, करे निरन्तर तव गुणगान ।
पा सकती नहिं अन्त गुणों का, कैसे पा सकते जन अन्य ?
अन्वयार्थ : हे तीन भुवन के स्तुति के पात्र! संसार में 'सरस्वती' आपकी स्तुति करती है, किन्तु वह भी आपके गुणों के अन्त को प्राप्त नहीं कर सकती है; तब अन्य जो मूर्ख पुरुष हैं, वह यदि आपके गुणों की स्तुति करें तो कैसे आपके गुणों का अन्त पा सकेंगे?