
खयरिव्व संचरंती, तिहुयणगुरु तुह गुणोहगयणम्मि ।
दुरं पि गया सुइरं, कस्स गिरा पत्तपेरंता ॥58॥
खचरीव संचरती, त्रिभुवनगुरो तव गुणौघगगने ।
दूरमपि गता सुचिरं, कस्य गो: प्राप्तपर्यन्ता॥
हे त्रिभुवन गुरु! गुण-समूहरूपी नभ में जो गमन करे ।
किसकी वाणीरूप पक्षिणी, उड़े दूर तक अन्त लहे॥
अन्वयार्थ : हे त्रिभुवन गुरु! आपके गुणसमूहरूपी आकाश में गमन करने वाली तथा दूर तक पहुँची ऐसी किसकी वाणीरूपी पक्षिणी है, जो उसके अन्त को प्राप्त हो सके?