
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, णट्ठं चिय मण्णयं महापावं ।
रविउग्गमे णिसाए, ठाइ तमं कित्तियं कालं ॥4॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! नष्टमिव मन्ये महापापम् ।
रव्युद्गमे निशाया:, तिष्ठेत् तम: कियन्तं कालम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से ही, नष्ट हो गए सारे पाप ।
सूर्योदय होने पर निशि का, रहे अँधेरा कितने काल ?
अन्वयार्थ : हे जिनवर! आपको देखने मात्र से प्रबल पाप नष्ट हो गये हैं, सो ठीक ही है क्योंकि सूर्य का उदय होने पर रात्रि का अन्धकार कितने काल तक रह सकता है?