
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, सिज्झइ सो को वि पुण्णपब्भारो ।
होइ जणो जेण पहु, इहपरलोयत्थसिद्धीणं ॥5॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! सिध्यति स कोऽपि पुण्यप्राग्भार: ।
भवति जनो येन प्रभु:, इहपरलोकस्थसिद्धीनाम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, बँधता वह उत्तम पुण्य समूह ।
जिससे भविजन पा लेते हैं, उभय लोक का सिद्धि समूह॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देखने मात्र से मनुष्य को उस उत्तम पुण्य समूह की प्राप्ति होती है, जिसकी कृपा से वह इहलोक-परलोक की सिद्धियों का स्वामी हो जाता है ।