+ प्रभु-दर्शन से अविनाशी मोक्ष की प्राप्ति -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, मण्णे तं अप्प्णो सुकयलाहं ।
होही सो जेणासरिस,-सुहणिही अक्खओ मोक्खो ॥6॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! मन्ये तमात्मन: सुकृतलाभम् ।
भविष्यति येनासदृश,-सुखनिधि: अक्षयो मोक्ष:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, मानूँ मैं ऐसा पुण्य सुलाभ ।
जिससे अनुपम सुखनिधि एवं, अविनाशी हो शिवपद प्राप्त॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र प्रभो! आपको देखने का पुण्य-लाभ यह है कि उससे असाधारण सुखनिधि तथा अविनाशी - ऐसे मोक्षपद की प्राप्ति होती है ।