+ प्रभु-दर्शन से इन्द्रादि के ऐश्वर्य की तृष्णा से रहित सन्तोष की प्राप्ति -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, संतोसो मज्झ तह परो जाओ ।
इदंविहवो पि जणइ, ण तण्हालेसं पि जह हियए ॥7॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! सन्तोषो मम तथा परो जात: ।
इन्द्रविभवोऽपि जनयति, न तृष्णालेशमपि यथा हृदये॥
प्रभो! आपके दर्शन से, होता मुझको उत्तम सन्तोष ।
इन्द्र-विभूति भी मुझको, तृष्णा उत्पन्न करे नहिं लेश॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देखने मात्र से इन्द्र का ऐश्वर्य भी मेरे हृदय में लेश मात्र तृष्णा को उत्पन्न नहीं कर सकता - ऐसा वह उत्तम सन्तोष मुझे प्राप्त हुआ है ।