
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, वियारपडिवज्जिए परमसंते ।
जस्स ण हिट्ठी दिट्ठी, तस्स ण णियजम्मविच्छेओ ॥8॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! विकारपरिवर्जिते परमशान्ते ।
यस्य न हृष्टा दृष्टि:, तस्य न निजजन्मविच्छेद:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जिसको उत्पन्न न हो आनन्द ।
निर्विकार अरु परमशान्त नहिं, लखे उसे नहिं भव का अन्त॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको समस्त प्रकार के विकारों से रहित एवं परमशान्त देख कर, जिस मनुष्य की दृष्टि को आनन्द नहीं होता है, उस मनुष्य के अपने जन्म-मरण का कभी नाश नहीं होता ।