+ प्रभु-दर्शन के बाद भी आकुलता का होना पूर्वोपार्जित कर्मों का दोष -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, जम्मह कज्जंतराउलं हिययं ।
कइयावि हवइ पुव्वज्जियस्स कम्मस्स सो दोसो ॥9॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! यन्मम कार्यान्तराकुलं हृदयं ।
कदापि भवति पूर्वार्जितस्य कर्मण: स दोष:॥
प्रभो! आपके दर्शन करके, भी मन में यदि आकुलता ।
अन्य कार्य की, ताे यह मेरे, पूर्व-कर्म का दोष कहा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देख कर भी मेरा मन कभी-कभी दूसरे कार्यों में आकुलित हो जाता है, उसमें मेरे पूर्वोपार्जित कर्म ही दोषी हैं ।