
दिट्ठे तु म्मि जिणवर, अच्छउ जम्मंतरं ममेहावि ।
सहसा सुहेहिं घडियं, दुक्खेहिं पलाइयं दूरं ॥10॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! आस्तां जन्मान्तरं ममेहापि ।
सहसा सुखैर्घटितं, दु:खैश्च पलायितं दूरम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जन्मान्तर की क्या बात कहूँ
इस भव में ही नाना सुख, मिलते हैं, अघ सब दूर करूँ॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! आपके दर्शन से अन्य जन्मों की बात तो दूर रहो, किन्तु इस जन्म में भी मुझे नाना प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है और मेरे समस्त पाप दूर भाग जाते हैं ।