+ प्रभु-दर्शन के बाद ही दिन उत्तम तथा सफल -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, बज्झइ पट्ठो दिणम्मि अज्जयणे ।
सहलत्तणेण मज्झे, सव्वदिणाणं पि सेसाणं ॥11॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! बध्यते पट्ठो दिनेऽद्यतने ।
सफलत्वेन मध्ये, सर्वदिनानामपि शेषाणाम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जीवन का आज दिवस उत्तम ।
और सफल हो गया जान कर, मैंने किया पट्ट बन्धन॥
अन्वयार्थ : हे जिनवर! आपके दर्शन के कारण समस्त दिनों में आज का दिन उत्तम तथा सफल है - ऐसा जान कर मैंने पट्ट बन्धन किया है, मानो आज मेरा राज-तिलक हो गया है ।