+ प्रभु-दर्शन के बाद उनका बहुमूल्य मन्दिर, लक्ष्मी के संकेत घर के समान ज्ञात -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, भवणमिणं तुज्झ मह महग्घतरं ।
सव्वाणं पि सिरीणं, संकेयघरं व पडिहाइ ॥12॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! भवनमिदं तव महत्हार्घ्यतरम् ।
सर्वासामपि श्रीणां, संकेतगृहमिव प्रतिभाति॥
प्रभो! आपके दर्शन से, ऐसा मालूम हुआ मुझको ।
यह मन्दिर बहुमूल्य आपका, लक्ष्मी का संकेत अहो !
अन्वयार्थ : हे जिनेश्वर! आपके देखने मात्र से आपका यह बहुमूल्य मन्दिर, मेरे लिए समस्त प्रकार की लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए संकेत घर के समान ज्ञात होता है ।