
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, भत्तिजलोल्ल समासियं छेत्तं ।
जं तं पुलयमिसा पुण्णबीयमंकुरियमिव सोहइ ॥13॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! भक्तिजलौघेन समाश्रितं क्षेत्रम् ।
यत्तत्पुलकमिषात्, पुण्यबीजमंकुरितमिव शोभते॥
प्रभो! आपके दर्शन से, तन-खेत सिंचा भक्ति-जल से ।
रोमाञ्च हुए मुझको मानो, ये पुण्य-बीज के अंकुर हैं॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! आपको देखने से मेरा क्षेत्र , भक्तिरूपी जल से समाश्रित होता हुआ रोांचों के बहाने से ऐसा शोभित होता है, मानो अंकुरस्वरूप से परिणत पुण्य-बीज ही हैं ।