
दिट्ठे तु म्मि जिणवर, समयामयसायरे गहीरम्मि ।
रायाइदोसकलुसे, देवे को मण्णए सयाणे ॥14॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! समयामृतसागरे गम्भीरे ।
रागादिदोषकलुषे, देवे को मन्यते सज्ञान:॥
प्रभो! आपका दर्शन है, सिद्धान्तामृत सागर गम्भीर ।
रागादिक दोषों से कलुषित, देव कौन माने ज्ञानी ?
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! सिद्धान्तरूपी अमृत के गम्भीर समुद्र के समान आपको देखने पर ऐसा कौन होगा? जो रागादि दोषों से युक्त मलिन आत्माओं को देव मानेगा? अर्थात् कोई नहीं ।