+ प्रभु-दर्शन से अत्यन्त दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति भी सम्भव -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, मोक्खो अइदुल्लहो वि संपडइ ।
मिच्छत्तमलकलंकी, मणो ण जइ होइ पुरिसस्स ॥15॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! मोक्षोऽतिदुर्लभ: संप्रतिपद्यते ।
मिथ्यात्वमलकलंकित,-मनो न यदि भवति पुरुषस्य॥
प्रभो! आपके दर्शन से ही, होता दुर्लभ शिवपद प्राप्त ।
मन में हो यदि नहीं पुरुष के , किञ्चित् मल कलंक मिथ्यात्व॥
हे देव! यदि मनुष्य का मन, मिथ्यात्वरूपी कलंक से कलंकित नहीं हुआ हो
तो वह पुरुष, आपके दर्शन से अत्यन्त दुर्लभ मोक्षलक्ष्मी को भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ।
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य का चित्त, मिथ्यात्वरूपी मल से ग्रस्त हो, उसे कभी मोक्षप्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि जिस प्रकार पित्तज्वर वाले को मीठा दूध जहर के समान कडुआ लगता है; उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि को आपका उपदेश तथा दर्शन विपरीत ही लगता है । जब वह आपके उपदेश को ही अच्छा न मानेगा, तब तो उसे वास्तविक पदार्थ का स्वरूप नहीं मालूम पड़ सकता और पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को न जानने से वह अर्थात् मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकता; किन्तु जिस मनुष्य का मन, मिथ्यात्वरूपी कलंक से कलंकित नहीं है, वह आपके दर्शन से अत्यन्त कठिन मोक्ष को भी सुलभ रीति से प्राप्त कर लेता है ।