+ चर्म-नेत्रों से भी प्रभु-दर्शन की अद्भुत महिमा -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, चम्ममएणाच्छिण्णा वि तं पुण्णं ।
जं जणइ पुरो केवल,-दंसणणाणाइ णयणाइ ॥16॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! चर्म येनाक्ष्णापि तत्पुण्यं ।
यज्जनयति पुर: केवल,-दर्शनज्ञानानि नयनानि॥
प्रभो! आपके दर्शन करते चर्मचक्षु से यदि भविजन ।
पुण्य अपूर्व बँधे, जिससे हों केवलदर्शन-ज्ञान नयन॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जो मनुष्य, इस चर्म-नेत्र से आपको देखता है, उस मनुष्य को अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होती है, जो आगे केवलदर्शन तथा केवलज्ञानरूपी नेत्रों को उत्पन्न करता है ।