
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, सुकयत्थो मण्णिओ ण जेणप्पा ।
सो बहुयबुड्डुणुब्बुड्डणाइं भवसायरे काही ॥17॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! सुकृतार्थो मानितो न येनात्मा ।
स बहु मज्जनोन्मज्जनानि भवसागरे करिष्यति॥
प्रभो! आपके दर्शन से भी, जो नर नहिं कृतकृत्य हुआ ।
दीर्घ काल तक भव-सागर में, ऊपर-नीचे उतराता॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जिस मनुष्य ने आपको देख कर भी अपनी आत्मा को कृतकृत्य नहीं माना, वह मनुष्य नियम से संसाररूपी समुद्र में मज्जन तथा उन्मज्जन ही करेगा अर्थात् जिस प्रकार कोई मनुष्य, समुद्र में उछलता-डूबता रहता है; उसी प्रकार यह भी संसार में जन्म-मरण करता हुआ परिभ्रण करता रहता है ।