+ प्रभु-दर्शन से वचन-अगोचर आनन्द की प्राप्ति -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, णिच्छयदिट्ठीए होइ जं किं पि ।
ण गिराए गोयरं तं, साणुभवत्थं पि किं भणिमो ॥18॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! निश्चयदृष्ट्या भवति यत्किमपि ।
न गिरां गोचरं तत्, स्वानुभवस्थमपि किं भणाम:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जो कुछ निश्चय आनन्द होता ।
यद्यपि स्वानुभूति-गोचर वह, वचन-अगोचर कहना क्या ?
अन्वयार्थ : हे प्रभो! वास्तविक दृष्टि से आपको देखने पर हमको जो आनन्द होता है, वह मन (अनुभव) में स्थित होते हुए भी वचन-अगोचर है, इसलिए हम क्या कहें?