+ प्रभु का केवलज्ञान स्वरूप देखने से दर्शन-विशुद्धि की प्राप्ति -
दिट्ठे तु म्मि जिणवर, दट्ठव्वावहिविसेसरूवम्मि ।
दंसणसुद्धीए गयं, दाणिं मह णत्थि सव्वत्थ ॥19॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! दृष्टव्यावधिविशेषरूपे ।
दर्शनशुद्ध्या गतमिदानीं मम नास्ति सर्वार्थ:॥
प्रभो! आप हैं दर्शनीय, सकलार्थ जगत् के ज्ञान-स्वरूप ।
दर्श-विशुद्धि हुई है मुझको, बाह्य-पदार्थ नहीं मुझरूप॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! देखने योग्य पदार्थों की सीमा के विशेषस्वरूप अर्थात् केवलज्ञानस्वरूप आपको देखने पर, समस्त बाह्य पदार्थों से भिन्न होकर मैं 'दर्शन विशुद्धि' को प्राप्त हुआ ।