+ प्रभु-दर्शन से दृष्टि सूर्य से भी अधिक निर्मल एवं सुखी -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, अहियं सुहिया समुज्जला होई ।
जणदिट्ठी को पेच्छइ, तद्दंसणसुहयरं सूरं ॥20॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! अधिक सुखिता समुज्ज्वला भवति ।
जनदृष्टि: क: प्रेक्षते, तद्दर्शनसुखकरं सूरम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जन-दृष्टि होती अधिक सुखी ।
अति निर्मल भी होती तो फिर, सूर्य देखता कौन सुधी॥
अन्वयार्थ : हे देव! आपको देख कर, मनुष्यों की दृष्टि अधिक सुखी तथा अत्यन्त निर्मल हो जाती है, तो दर्शन एवं सुख को करने वाले सूर्य को कौन देखता है? अर्थात् कोई नहीं ।