+ प्रभु की महिमा जड़ एवं दोषाकार चन्द्रमा से कहीं अधिक -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, बुहम्मि दोसोज्झियम्मि वीरम्मि ।
कस्स किल रमइ दिट्ठी, जडम्मि दोसायरे खत्थे ॥21॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! बुद्धे दोषोज्झिते वीरे ।
कस्य किल रमते दृष्टि:, जडे दोषाकरे खस्थे॥
प्रभो! आपको देख ज्ञानमय, वीर और सब दोष-विहीन
किसकी दृष्टि करे दोषमय, नभ-गोचर जड़ शशि से प्रीति॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको समस्त दोषों से रहित, ज्ञानवान् और वीरता से युक्त देख कर, ऐसा कौन मनुष्य है; जिसकी दृष्टि जड़, दोषों की खान और आकाश में रहने वाले चन्द्रमा में प्रीति करेगी?