+ प्रभु-दर्शन के सामने चिन्तामणि कल्पवृक्ष भी प्रभारहित -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, चिंतामणिकामधेणुकप्पतरू ।
खज्जोयव्व पहाए, मज्झ मणे णिप्पहा जाया ॥22॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! चिन्तामणिकामधेनुकल्पतरव: ।
खद्योता इव प्रभाते, मम मनसि निष्प्रभा जाता:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, चिन्तामणि कामधेनु सुरवृक्ष ।
प्रात:काल के जुगनू जैसे, मेरे मन में हैं निष्प्रभ॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिस प्रकार प्रात:काल में जुगनू प्रभारहित हो जाता है; उसी प्रकार आपको देखने पर चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पवृक्ष मेरे मन से प्रभारहित हो गये हैं ।