
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, रहसरसो मह मणम्मि जो जाओ ।
आणंदंसुमिसा सो, तत्तो णीहरइ बहिरंतो ॥23॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! रहस्यरसो मम मनसि यो जात: ।
आनन्दाश्रुमिषात्, स ततो निस्सरति बहिरन्त:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, जो हुआ प्रेम-रस मम उर में ।
आनन्दाश्रु बन कर भीतर, से निकला है बाहर में॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! आपको देखने से मेरे मन से उत्पन्न रहस्यमय प्रेरस, आनन्दाश्रुओं के बहाने भीतर से बाहर निकल रहा है - ऐसा मालूम होता है ।