
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, कल्लाणपरंपरा पुरो पुरिसे ।
संचरइ अणाहूया वि, ससहरे किरणमाल व्व ॥24॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! कल्याणपरम्परा पुर: पुरुषस्य ।
संचरति अनाहूताऽपि, शशधरे किरणमाला इव॥
प्रभो! आपके दर्शन से, कल्याण स्वयं आगे आये ।
बिना बुलाए, यथा चन्द्र के, आगे किरणावलि चले॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जिस प्रकार चन्द्रमा के किरणों की पंक्ति आगे-आगे गमन करती है; उसी प्रकार आपके दर्शन से बिना बुलाये ही कल्याण की परम्परा आगे-आगे गमन करती है ।