
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, दिसवल्लीओ फलंति सव्वाओ ।
इट्ठां अहुल्लिया वि हु, वरिसइ सुण्णं पि रयणेहिं ॥25॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! दिशवल्य: फलन्ति सर्वा: ।
इष्टमफुल्लिताऽपि खलु, वर्षति शून्योऽपि रत्नै:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, बिन पुष्प! दिक्-लताएँ फलती ।
इष्ट-पदार्थों को देती अरु, नभ से रत्नवृष्टि होती॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश्वर! आपके दर्शन से, बिना पुष्पित भी समस्त दशों दिशाएँ इष्ट पदार्थों को देती है तथा रत्नों से रहित आकाश भी रत्नों की वृष्टि करता है ।