
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, भव्वो भयवज्जिओ हवे णवरं ।
गयणिंदच्चिय जायइ, जोण्हापसरे सरे कुमुयं ॥26॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! भव्यो भयवर्जितो भवेन्नवरिम् ।
गतनिद्र एव जायते, ज्योत्स्नाप्रसरे सरसि कुमुदम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, भवि मोहमुक्त भयहीन सुखी ।
जैसे सर में खिले कुमुदनी, चन्द्र-ज्योत्सना जब फैली॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार चाँदनी के विकसित होने पर रात्रि-विकासी कमल, सरोवर में शीघ्र ही प्रफुल्लित होते हैं; उसी प्रकार हे जिनेश! आपके दर्शन मात्र से ही भव्य जीव, समस्त भय एवं मोहरूपी निद्रा से रहित होकर सुखी हो जाते हैं ।