+ प्रभु-दर्शन से मेरे हृदय में अत्यन्त प्रसन्नता -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, हियएण मह सुहं समुल्लसियं ।
सरिणाहेणिव सहसा, उग्गमिए पुण्णिमा इंदे ॥27॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! हृदयेन महासुखं समुल्लसितं ।
सरिन्नाथेनेव सहसा, उद्गमिते पूर्णिमाचन्द्रे॥
प्रभो! आपके दर्शन से, मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ ।
नभ में पूर्ण चन्द्र, विकसित होने पर ज्यों सागर उछला॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र, अत्यन्त उल्लसित होता है, उसी प्रकार आपके दर्शन से मेरा हृदय, आनन्द के कारण अत्यन्त उल्लसित हो रहा है ।