
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, दोहिमि चक्खूहिं तह सुही अहियं ।
हियए जह सहसाहो, होहि त्ति मणोरहो जाओ ॥28॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! द्वाभ्यां चक्षुभ्यां तथा सुखी अधिकम् ।
हृदये यथा सहस्रार्थो, भविष्यति इति मनोरथो जात:॥
प्रभो! आपके दर्शन से, मैं इतना अधिक प्रसन्न हुआ ।
जैसे मानो बहुत शीघ्र ही, मेरा मनरथ सिद्ध हुआ॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! आपको देख कर, मैं हृदय में इतना अधिक सुखी हुआ, मानो शीघ्र ही मेरे सारे प्रयोजन सिद्ध हो जाएँगे - ऐसा मेरा सम्पूर्ण मनोरथ ही सिद्ध हुआ है ।