+ प्रभु-दर्शन से जन्मरूपी शत्रु भी मेरा परम मित्र -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, भवो वि मित्तत्तणं गओ एसो ।
एयम्मि ठियस्स जओ, जायं तुह दंसणं मज्झ ॥29॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! भवोऽपि मित्रत्वं गत एष ।
एतस्मिन् स्थितस्य यत:, जातं तव दर्शनं मम॥
प्रभो! आपके दर्शन से, यह जन्म हुआ मेरा अति मित्र ।
क्योंकि इसी जीवन में मुझको, दर्श मिला तव परमपवित्र॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! आपके दर्शन से यह जन्म, मेरा परम मित्र बन गया है क्योंकि इस जन्म में ही मुझे आपका दर्शन हुआ है ।