+ प्रभु-दर्शन से मृत्यु के समय में भी धीरता की प्राप्ति -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, सुहगइसंसाहणेक्कबीयम्मि ।
कंठगयजीवियस्स वि, धीरं संपज्जए परमं ॥31॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! शुभगतिसंसाधनैकबीजे ।
कण्ठगतजीवितस्यापि, धैर्यं सम्पद्यते परमम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से, शुभ गति के साधक बीज-स्वरूप ।
मरणासन्न जीव भी धारण, करता उत्तम धैर्य अनूप॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! शुभ गति की सिद्धि में असाधारण कारण - ऐसे आपके दर्शन करने से जिसके प्राण कण्ठ तक आ गये हैं अर्थात् जो तत्काल मरनेवाला है - ऐसे प्राणी को भी उत्तम धीरता आ जाती है ।