
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, कमम्मि सिद्धे ण किं पुरा सिद्धं ।
सिद्धियरं को णाणी, इहइ ण तुह दंसणं तम्हा ॥32॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! क्रमे सिद्धे न किं पुरा सिद्धम् ।
सिद्धिकरं को ज्ञानी, इच्छति न तव दर्शनं तस्मात्॥
प्रभो! आपके दर्शन से है, कौन वस्तु जो मिली नहीं ?
तो फिर किस ज्ञानी को, तेरे दर्शन की अभिलाष नहीं॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! आपके दर्शन से आपके चरण-कमलों की प्राप्ति होने पर - ऐसी कौनसी वस्तु बाकी रही जो मुझे न मिली हो? अर्थात् मुझे समस्त पदार्थों की सिद्धि हुई है; इसलिए ऐसा कौनसा ज्ञानी है, जो आपके दर्शनों की इच्छा न रखता हो?