
श्रुतादिकेवल्यपि तावकीं श्रियं, स्तुवन्नशक्तोऽहमिति प्रपद्यते ।
जयेति वर्णद्वयमेव मादृशा, वदन्ति यद्देवि! तदेव साहसम् ॥4॥
मात! आपकी स्तुति करने, में श्रुत-केवलि भी असमर्थ ।
हम जैसे तो दो अक्षर 'जय', बोलें यह भी अति साहस॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! 'श्रुत है आदि में जिनके ऐसे केवली' अर्थात् श्रुतकेवली भी 'मैं सरस्वती की शोभा-स्तुति करने में असमर्थ हूँ' - ऐसा कह कर आपका वर्णन करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं तो मुझ जैसे मनुष्यों की तो क्या बात है? अर्थात् मुझ जैसे मनुष्य आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते । अत: हे देवी! मेरे समान मनुष्य आपके लिए 'जय' - इन दो वर्णों का भी उच्चारण करते हैं तो यह बड़े साहस की बात है - ऐसा समझना चाहिए ।