+ हे माता! आपकी कृपा से ही जीवाजीवादि पदार्थों का ज्ञान -
त्वमत्र लोकत्रयसद्मनि स्थिता,
प्रदीपिका बोधमयी सरस्वति !
तदन्तरस्थाऽखिलवस्तुसंचयं,
जना: प्रपश्यन्ति सदृष्टयोऽप्यत: ॥5॥
हे माता! तुम त्रिभुवन घर में, सम्यग्ज्ञानमयी दीपक ।
जिससे ज्ञानी जीव जगत् की, सकल वस्तुओं के दर्शक॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! आप तीन लोकरूपी घर में स्थित सम्यग्ज्ञानमय उत्कृष्ट दीपक के समान हो, जिसकी कृपा से सम्यग्दृष्टि जीव, उन तीन लोकों के भीतर रहनेवाले जीवाजीवादि पदार्थों को भलीभाँति देख लेते हैं ।