
नभ: समं वर्त्म तवातिनिर्मलं, पृथु प्रयातं विबुधैर्न कैरिह ।
तथापि देवि! प्रतिभासते तरां, यदेतदक्षुण्णमिव क्षणेन तत् ॥6॥
नभवत् निर्मल विस्तृत तव पथ, कौन सुबुध नहिं गमन करे ।
किन्तु भासता है क्षण भर में, माता! वह अक्षुण्ण अरे !
अन्वयार्थ : हे देवी! आपका मार्ग, आकाश के समान अत्यन्त निर्मल और विस्तीर्ण है, उस मार्ग में ऐसे कौन विबुध हैं, जो नहीं गये हों? अर्थात् सभी गये हैं; तथापि हे माता! ऐसा प्रतीत होता है कि आपका वह मार्ग अक्षुण्ण ही है, मानो उस मार्ग से कोई नहीं गया है ।