+ हे सरस्वती माता! आपकी कृपा से ही समस्त गुणों की प्राप्ति -
भवत्कला यत्र न वाणि मानुषे, न वेत्ति शास्त्रं स चिरं पठन्नपि ।
मनागपि प्रीतियुतेन चक्षुषा, यमीक्षसे कैर्न गुणै: स भूष्यते ॥8॥
पढें निरन्तर किन्तु न जानें, शास्त्रों को तव कृपा-विहीन ।
तनिक स्नेहमय नेत्रों से तुम, देखो तो गुण कौन नहीं ?
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! जिस मनुष्य में आपकी कला नहीं है अर्थात् जो मनुष्य आपका कृपा-पात्र नहीं है, वह बहुत काल तक पढ़ता हुआ भी शास्त्र को नहीं जानता; किन्तु जिस मनुष्य को आप थोडा-भी स्नेहयुक्त नेत्र से देख लेती हो अर्थात् जो आपका कृपा-पात्र बन जाता है, वह मनुष्य संसार में समस्त गुणों से विभूषित होता है अर्थात् बिना प्रयत्न के ही वह समस्त गुणों का भण्डार बन जाता है ।