
चिरादतिक्लेश-शतैर्भवाऽम्बुधौ,
परिभ्रमन् भूरि नरत्वमश्नुते ।
तनूभृदेतत् पुरुषार्थ-साधनं,
त्वया विना देवि! पुन: प्रणश्यति ॥10॥
भवदधि में चिर भ्रमे जीव, बहु कष्टों से नरगति पाता ।
जिसमें हों पुरुषार्थ सभी, पर बिना आपके खो देता॥
अन्वयार्थ : इस संसार-समुद्र में चिरकाल से भ्रमण करता हुआ यह जीव, सैंकड़ों क्लेशों को सह कर, मनुष्य जन्म पाता है तथा वह मनुष्य जन्म ही समस्त पुरुषार्थों का एकमात्र साधन है; अत: हे देवी! आपके बिना प्राप्त हुआ वह मनुष्य भव भी व्यर्थ हो जाता है ।