
कदाचिदम्ब! त्वदनुग्रहं विना,
श्रुते ह्यधीतेऽपि न तत्त्वनिश्चय: ।
तत: कुत: पुंसि भवेद्विवेकिता,
त्वया विमुक्तस्य तुजन्म निष्फलम् ॥11॥
शास्त्र पढ़ें पर नहीं तत्त्व-निर्णय माँ! तेरी कृपा-विहीन ।
कैसे हो सकता विवेक? नर-जन्म वृथा यदि कृपा नहीं॥
अन्वयार्थ : हे माता! आपके अनुग्रह के बिना शास्त्र का भले प्रकार अध्ययन करने पर भी वास्तविक तत्त्व का निश्चय नहीं होता और वास्तविक तत्त्व-निश्चय के बिना मनुष्य में हिताहित विवेक भी जागृत नहीं हो सकता; इसलिए हे देवी! आपके अनुग्रह से रहित पुरुषों का मनुष्य जन्म पाना निष्फल ही है ।