
विधाय मात: प्रथमं त्वदाश्रयं,
श्रयन्ति तन्मोक्षपदं महर्षय: ।
प्रदीपमाश्रित्य गृहे तमस्तते,
यदीप्सितं वस्तु लभेत मानव: ॥12॥
माता! तेरे आश्रय से ही, महाऋषि शिवपद पाते ।
अन्धकार से भरे सदन में, दीपक से जन वस्तु लखें॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मनुष्य, अन्धकार से व्याप्त घर में दीपक के आश्रय से इष्ट वस्तु को प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार हे माता! बड़े-बड़े ऋषि, आपका आश्रय करके प्रसिद्ध मोक्षपद को प्राप्त का लेते हैं ।